ध्वनियाँ और वर्ण - sounds and characters

उच्चारण अवयव


क्या आपने कभी सोचा है कि ध्वनियों का उच्चारण हम कैसे करते हैं? यह तो आप जानते ही हैं कि हम सभी नाक से साँस लेते हैं जो हमारे फेफड़ों में जाती है और बोलते समय मुख के रास्ते से बाहर निकाल दी जाती है। क्या आप मुँह बन्द करके बोल सकते हैं ? नहीं बोल सकते। फेफड़ों से आने वाली यह श्वास (साँस) जब मुख के रास्ते से बाहर निकलती है तब, दो कार्य हो सकते हैं-


(1) इस वायु को बिना किसी रुकावट या अवरोध (Obstruction) के मुख से बाहर निकाल दिया जाए अथवा


(ii) जीभ या निचले ओठ द्वारा इसके रास्ते में मुख में अलग-अलग स्थानों पर 'रुकावट' या 'अवरोध' (obstruction) उत्पन्न किया जाए।


ध्यान रखिए, भाषिक ध्वनियों के उच्चारण में ये दोनों ही कार्य सम्पन्न होते हैं। कुछ ध्वनियों के उच्चारण में वायु बिना किसी रुकावट के बाहर निकलती है तो कुछ ध्वनियों के उच्चारण में इस वायु के रास्ते में रुकावट पैदा की जाती है। हम सभी के मुख में रुकावट पैदा करने वाले दो अंग हैं- 'निचला ओठ' तथा 'जीभ' । इन अंगों को ही 'उच्चारण अवयव' (Articulaters) कहा जाता है। ये उच्चारण अवयव मुख में आगे-पीछे, ऊपर- नीचे जाकर मुख से बाहर निकलने वाली वायु के रास्ते में अवरोध उत्पन्न करते हैं और इसी रुकावट के परिणामस्वरूप अनेक ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं।

उदाहरण के लिए यदि आप 'तू' ध्वनि का उच्चारण करते हैं तो जीभ की नोंक ऊपर उठकर ऊपरी दाँतों के पिछले भाग को स्पर्श करती है तथा 'प्' ध्वनि के उच्चारण में निचला ओठ ऊपर उठकर ऊपरी ओठ का स्पर्श करता है जिससे मुख से बाहर निकलने वाली वायु के मार्ग में अवरोध उत्पन्न हो जाता है जबकि, 'आ' या 'ई' ध्वनियों के उच्चारण में जीभ ऊपर तो उठती है पर इतनी ऊँची नहीं जाती कि मुख से बाहर निकलने वाली वायु का रास्ता अवरुद्ध हो सके इस तरह 'आ' तथा 'ई' ध्वनियों का उच्चारण बिना किसी रुकावट या अवरोध के किया जाता है। कहने का तात्पर्य यही है कि भाषिक ध्वनियों के उच्चारण में 'उच्चारण अवयवों' की भूमिका सबसे प्रमुख है।


खंडीय तथा खंडेतर ध्वनियाँ


हर भाषा में दो तरह की ध्वनियाँ पाई जाती हैं खंडीय ध्वनियाँ एवं खंडेतर ध्वनियाँ। अब हम इन दोनों - के सम्बन्ध में चर्चा करेंगे- -


(क) खंडीय ध्वनियाँ-


'खंडीय ध्वनियाँ वे ध्वनियाँ हैं जिनके खण्ड विभिन्न अभिलक्षणों (Features) में किए जा सकते हैं। समस्त स्वर एवं व्यंजन ध्वनियाँ इसी वर्ग में आती हैं। वस्तुतः प्रत्येक व्यंजन और स्वर ध्वनि अपने में अनेक गुण या अभिलक्षण समाहित किये रहती है। उदाहरण के लिए त, थ, द, ध, चारों ही व्यंजन दन्त्य व्यंजन कहलाते हैं, क्योंकि इनके उच्चारण में जीभ की नोंक ऊपर के दाँतों को जाकर स्पर्श करती है और मुख से बाहर निकलने वाली वायु के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती है।

लेकिन यदि यह जानना हो कि इन चारों में परस्पर क्या अन्तर है तो हमें इन चारों के उच्चारणात्मक अभिलक्षणों (गुणों) को बताना होगा जो इस प्रकार होंगे -


त्


अल्पप्राण, अघोष, स्पर्शी, दन्त्य


थ् - महाप्राण, अघोष, स्पर्शी, दन्त्य


द् - अल्पप्राण, सघोष, स्पर्शी, दन्त्य महाप्राण, सघोष, स्पर्शी, दन्त्य


ध्


कहने का तात्पर्य यही है कि स्वर तथा व्यंजन ध्वनियाँ ऐसी ध्वनियाँ हैं जिनके खण्ड विभिन्न अभिलक्षणों में किए जा सकते हैं; अतः ये सभी 'खंडीय ध्वनियाँ कहलाती हैं।


(ख) खंडेतर ध्वनियाँ-


खंडीय ध्वनियों के अलावा भाषाओं में ऐसी ध्वनियाँ भी पाई जाती हैं जिनके खण्ड नहीं किए जा सकते, क्योंकि ये अपने में ही एक 'अभिलक्षण' होती हैं। उदाहरण के लिए 'हिन्दी में 'अनुनासिकता' एक ऐसा ही अभिलक्षण है। वस्तुतः अनुनासिकता स्वरों का ऐसा गुण है जिसमें स्वरों का उच्चारण करते समय वायु मुख के साथ-साथ नासिका मार्ग से भी बाहर निकलती है। इस तरह मूल स्वरों की तुलना में जब 'अनुनासिक स्वरों' का उच्चारण किया जाता है तो केवल एक अभिलक्षण (मुँह के साथ-साथ नाक से भी वायु बाहर निकलना) के कारण ही शब्द का अर्थ बदल जाता है,

जैसे- सास साँस, भाग भाँग आदि ।


अनुनासिकता के अलावा बलाघात, तान, अनुतान आदि भी खंडेतर ध्वनियाँ हैं, जिनके खण्ड अन्य अभिलक्षणों में नहीं किए जा सकते। खडेतर ध्वनियाँ चूँकि स्वयं में ही एक अभिलक्षण होती हैं। अतः अलग से स्वतन्त्र रूप में इनका उच्चारण भी नहीं किया जा सकता।