वाच्य - speech
वाच्य से तात्पर्य
'वाच्य' का अर्थ है- 'वाणी' या 'कथन' अर्थात् लगभग एक ही बात को अर्थ में थोड़ा अन्तर लाकर दो तरह से कहना। जैसे- -
(1) लड़का सेब खाता है।
(ii) लड़के से / के द्वारा सेब खाया जाता है।
यद्यपि इन दोनों वाक्यों का मोटा-मोटा अर्थ तो एक ही है पर फिर भी दोनों वाक्यों के अर्थ में थोड़ा सा अन्तर है। पहले वाक्य में लड़के ने सेब खाने का जो कार्य किया है उसको वक्ता द्वारा प्रधानता (Importance) दी गई है जब कि दूसरे वाक्य में लड़के के कार्य को वक्ता द्वारा निरस्त करने या नकारने का काम किया गया है।
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किसी कार्य को निरस्त करने या नकारने का अर्थ है यह दिखाने की कोशिश करना कि मानों वाक्य की क्रिया को करने में कर्त्ता की कोई भूमिका नहीं है। हिन्दी में कर्त्ता के कार्य को और अधिक निरस्त करने के लिए प्रायः वाक्य से कर्त्ता का लोप ही कर दिया जाता है, जैसे-
माँ खाना बना रही है।
(ii) माँ के द्वारा खाना बनाया जा रहा है।
( कर्त्ता के कार्य को प्रधानता दिया जाना)
;(iii) खाना बनाया जा रहा है।
(कर्ता के कार्य को निरस्त किया जाना) (कर्ता के कार्य को और अधिक निरस्त करना)
वाच्य के भेद
वाक्य में कर्त्ता के कार्य को प्रधानता देने अथवा निरस्त किए जाने के आधार पर वाच्य के दो भेद किए जाते हैं - 'कर्तृवाच्य' (Active Voice) तथा 'अकर्तृवाच्य' (Passive Voice)।
(1) कर्तृवाच्य (Active Voice)
जिन वाक्यों में वक्ता द्वारा कर्त्ता के कार्य को 'प्रधानता' दी जाती है या 'महत्त्व' दिया जाता है,
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वे वाक्य 'कर्तृवाच्य' के अन्तर्गत आते हैं। कर्तृवाच्य के वाक्यों में 'अकर्मक' तथा 'सकर्मक' दोनों ही प्रकार की क्रियाएँ आ सकती हैं, जैसे-
| अकर्मक क्रिया वाले कर्तृवाच्य के वाक्य
सकर्मक क्रिया वाले कर्तृवाच्य के वाक्य
वह रिक्शा चलाता है।
बच्चा सुबह से रो रहा है। हम लोग आज नहीं दौड़े।
बच्चे ने सुन्दर चित्र बनाया।
;आप कब वापस आ रहे हैं ?
हमने कल ही यह फिल्म देखी थी।
'कर्तृवाच्य' के वाक्यों में कर्त्ता को प्रधानता दिए जाने का अर्थ कुछ व्याकरण लेखकों ने यह ले लिया है कि 'क्रिया' केवल कर्त्ता के लिंग / वचन के अनुसार ही बदलती है, लेकिन ऐसा नहीं हैं, क्रिया के बदलने का सम्बन्ध 'वाच्य' के साथ नहीं होता। वस्तुतः किसी भी वाच्य का वाक्य हो 'क्रिया' उस संज्ञा के अनुसार बदलती है जिसके बाद कोई परसर्ग नहीं लगा होता।
;(2) अकर्तृवाच्य (Passive Voice)
'अकर्तृवाच्य' के वाक्यों से तात्पर्य है उन वाक्यों से है 'जो कर्तृवाच्य के नहीं हैं' अर्थात् जिन वाक्यों में वक्ता द्वारा कर्त्ता के कार्य को 'निरस्त' कर दिया गया है। वाक्य को निरस्त करने के लिए वाक्य की संरचना में निम्नलिखित परिवर्तन किए जाते हैं।
(क) कर्त्ता के बाद 'के द्वारा' या 'से' परसर्ग लगाया जाता है।
(ख) क्रिया के मध्य में 'जा' प्रत्यय जोड़ा जाता है।
;(ग) क्रिया की धातु या मुख्य क्रिया में भूतकालिक प्रत्यय ('आ/ई/ए') जोड़ दिया जाता है।
अकर्तृवाच्य के भेद
अकर्तृवाच्य के वाक्यों में 'सकर्मक क्रिया' का प्रयोग किया गया है या 'अकर्मक क्रिया' का, इस आधार पर 'अकर्तृवाच्य' के दो भेद किए जाते हैं कर्मवाच्य तथा भाववाच्य ।
कर्मवाच्य -
'अकर्तृवाच्य' के वे वाक्य जिनमें 'सकर्मक क्रिया' का प्रयोग हुआ है 'कर्मवाच्य' के वाक्य कहलाते हैं। जैसे,
;(01) हलवाई के द्वारा मिठाई बनाई गई।
(ii) पुलिस द्वारा चोर को बहुत पीटा गया।
(iii) किसी के द्वारा भी काम पूरा नहीं किया गया।
(iv) मुझसे झूठ नहीं बोला गया।
उपर्युक्त सभी वाक्य अकर्तृवाच्य के हैं तथा सभी में 'सकर्मक क्रिया' का प्रयोग हुआ है अतः ये सभी वाक्य 'कर्मवाच्य' के वाक्य कहे जाएँगे।
;प्रायः लोग यह समझते हैं कि 'कर्मवाच्य' में क्रिया केवल 'कर्म' के अनुसार बदलती है पर यह बात नही सही नहीं है। यदि 'कर्म' के बाद भी कोई परसर्ग लग होता है तो क्रिया 'कर्म' के अनुसार भी नहीं बदलती, जैसे:
(i) बच्चे के द्वारा पंखा चलाया गया।
(ii) बच्चे के द्वारा मशीन चलाई गई।
(iii) बच्चे के द्वारा पंखे / मशीन को चलाया गया।
(कर्म के अनुसार नहीं बदल रही)
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भाववाच्य-
'अकर्तृवाच्य' के वे वाक्य जिनमें 'अकर्मक क्रिया' का प्रयोग किया जाता है, 'भाववाच्य' के अन्तर्गत
आते हैं, जैसे-
(1) मच्छरों के कारण कल मुझसे नहीं सोया गया।
(ii) खिलाड़ियों से आज दौड़ा नहीं गया। (iii) उनसे अब नहीं भागा जाता।
(iv) मुझसे अब नहीं चला जाता।
;उपर्युक्त सभी वाक्य 'अकर्तृवाच्य' के हैं तथा इनमें 'अकर्मक क्रिया' का प्रयोग हुआ है अतः ये सभी 'भाववाच्य' के वाक्य कहलाएँगे।
कर्मवाच्य तथा भाववाच्य में अन्तर -
'गुणों के स्तर पर, 'कर्मवाच्य' तथा 'भाववाच्य' में कोई अन्तर नहीं होता। दोनों ही 'अकर्तृवाच्य' (Passive Voice) के भेद हैं। अन्तर केवल इस बात को लेकर है कि 'कर्मवाच्य' वाले वाक्यों की क्रिया 'सकर्मक' होती है तथा 'भाववाच्य' वाले वाक्यों की क्रिया 'अकर्मक' ।
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