शैलीविज्ञान और साहित्य-समीक्षा - stylistics and literary criticism

प्रायः देखा गया है कि केवल भाषा वैज्ञानिक उपादानों के प्रयोग से साहित्यिक रचना के मूल्यांकन का कार्य साहित्य में रुचि रखने वाले भाषा वैज्ञानिक ही करते हैं, साहित्य के आलोचक इनका प्रयोग बहुत कम करते हैं। इसलिए शैली वैज्ञानिक और साहित्य-समीक्षक दोनों का लक्ष्य भी अलग-अलग है। शैली वैज्ञानिक अध्ययन का लक्ष्य भाषा की प्रविधियों को समझना या किसी भाषिक सिद्धान्त की प्रामाणिकता के उदाहरण प्रस्तुत करना, या फिर भाषा शिक्षण के ऐसे सिद्धान्तों की खोज करना होता है जिनका प्रयोग किसी साहित्यिक रचना में हुआ है।

शैलीवैज्ञानिक अध्ययन एक लक्ष्य वस्तुनिष्ठ ढंग से किसी साहित्यिक कृति के पाठ में ऐसे तत्त्वों की पहचान करना है जो उस कृति के महत्त्व के बारे में निर्णय करने में सहायक हो सके। यद्यपि इन प्रयासों से कृति के विश्लेषण और मूल्यांकन का कार्य पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि रचना के मूल्यांकन का कार्य सामाजिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के साथ इतनी मज़बूती से जुड़ा हुआ होता है कि इन भाषा-वैज्ञानिक निष्कर्षों से उसका समग्र मूल्यांकन प्रभावित नहीं होता है। निपट भाषिक मानों पर आधारित कृति निर्णय कला के यान्त्रिक उत्पादन की राह ही आसान करता है, साहित्य की गुणवत्ता का विकास नहीं करता है।


शैलीविज्ञान दूसरे अनुशासनों जैसे साहित्यिक अध्ययन, मनोविज्ञान तथा भाषाविज्ञान की कई विधियों का संगम है। वह अपने विशेष सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने की अपेक्षा प्रायः इन अनुशासनों के सिद्धान्तों और मॉडल को ही अपने अध्ययन के लिए काम में लेता है। इसमें उसका मुख्य ध्यान उस संचार प्रक्रिया पर रहता है जो कृति को विचार के केन्द्र में लाती है। अपने विवेचन में कृति बाह्य मानकों और सन्दर्भों को विचारणीय न बनाते हुए भी उसका ध्यान लेखक और रचना, पाठक और रचना तथा उस परिवेश पर भी रहता है जिसमें कृति की रचना होती है और उसे ग्रहण किया जाता है अर्थात् पढ़ा और समझा जाता है।


व्यावहारिक भाषाविज्ञान की एक शाखा के रूप में शैलीविज्ञान कृति का अध्ययन और व्याख्या उसकी भाषिक संरचना और ध्वनि संकेतों के आधार पर करता है। एक अध्ययन विधि के रूप में यह भाषाविज्ञान और साहित्यिक आलोचना के समन्वय का कार्य करती है। शैलीविज्ञान के क्षेत्र में अधुनातन खोजों तथा आलोचनात्मक शैलीविज्ञान, बहुरूपात्मक शैलीविज्ञान और मध्यस्थ शैलीविज्ञान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ग़ैर- साहित्यिक रचनाएँ भी शैली वैज्ञानिक के लिए उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी कि साहित्यिक रचनाएँ। एक अवधारणात्मक अनुशासन के तौर पर शैलीविज्ञान ऐसे नियमों की स्थापना करता है जिनके आधार पर व्यक्तियों और सामाजिक समूहों और समुदायों द्वारा भाषा-विशेष के प्रयोग को समझा जा सकता है। इन नियमों को साहित्यिक रचना, साहित्यिक विधाओं, लोक कलाओं, बोलियों तथा आख्यानों के विश्लेषण और साहित्यिक आलोचना जैसे अनेक क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है।