स्वर तथा व्यंजन ध्वनियाँ - vowel and consonant sounds
हर भाषा में दो तरह की खंडीय ध्वनियाँ पाई जाती हैं- 'स्वर' तथा 'व्यंजन' अब हम इन दोनों के विषय में चर्चा करेंगे-
(क) स्वर- -
'स्वर' वे ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में वायु बिना किसी रुकावट के मुख से बाहर निकलती है अर्थात् जिनके उच्चारण में वायु के मार्ग में कोई अवरोध नहीं होता।
जैसा ऊपर बताया गया है, स्वरों के उच्चारण में जीभ ऊपर-नीचे तो आती-जाती है पर इतना ऊपर नहीं जाती कि हवा का रास्ता रुक सके। आप स्वयं 'अ', 'इ', 'उ', 'ए' आदि स्वरों का उच्चारण करके देखिए।
आप अनुभव करेंगे कि मुख के ऊपरी जबड़े और जीभ (उच्चारण अवयव) के बीच काफी जगह (space) रह जाती है जिसके बीच से वायु बिना किसी रुकावट या अवरोध के बाहर निकल जाती
(ख) व्यंजन-
जब व्यंजनों का उच्चारण किया जाता है तो 'उच्चारण अवयव (निचला ओठ या जीभ) ऊपर उठकर ऊपरी जबड़े को या तो स्पर्श करके हवा का रास्ता रोकते हैं या उसके इतना निकट पहुँच जाते हैं। कि दोनों के बीच बहुत कम जगह रह जाती है और वायु घर्षण करती हुई बाहर निकलती है। 'स्पर्श' हो या 'घर्षण', बाहर निकलने वाली वायु का मार्ग दोनों प्रयत्नों में ही अवरुद्ध हो जाता है और इस अवरोध (रुकावट) के फलस्वरूप जो ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं वे 'व्यंजन' कहलाती हैं।
उदाहरण के लिए 'च' व्यंजन के उच्चारण में जिह्वा फलक (Blade of the tongue) ऊपर उठकर तालु को स्पर्श करता है। जिससे वायु का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है तथा 'स्' व्यंजन के उच्चारण में जीभ की नोंक ऊपरी दाँतों के बहुत निकट आ जाती है तथा जीभ और दाँतों के बीच बहुत कम जगह रह जाती है और वायु घर्षण करती हुई बाहर निकलती है। कहने का तात्पर्य यही है कि- व्यंजन वे ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में उच्चारण- अवयव मुख के ऊपरी जबड़े के विभिन्न स्थानों पर पहुँचकर मुख से बाहर निकलने वाली वायु के रास्ते में रुकावट या अवरोध पैदा करते हैं। इसके अलावा व्यंजन की एक विशेषता यह भी है कि जब भी किसी व्यंजन का उच्चारण स्वतन्त्र रूप से किया जाता है तो हमेशा किसी न किसी स्वर की सहायता से ही होता है। भाषा कोई भी हो, व्यंजन का स्वतन्त्र रूप में उच्चारण सदैव किसी न किसी स्वर की मदद से ही होता है।
वार्तालाप में शामिल हों