देवनागरी लिपि का मानकीकरण - Standardization of Devanagari script

देवनागरी लिपि का मानकीकरण - Standardization of Devanagari script

देवनागरी लिपि के मानकीकरण के प्रयास सन् 1947 में लगभग भारत के स्वतन्त्र होने के बाद से ही शुरू हो गए थे। 31 जुलाई 1947 को उत्तरप्रदेश सरकार ने आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में सात सदस्यों की नागरी लिपि सुधार समिति का गठन किया जिसका उद्देश्य काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा सुझाए गए परिवर्तनों की उपयुक्तता की परीक्षा करना तथा मुद्रण, कंपोज़िंग तथा टंकण की दृष्टियों से देवनागरी लिपि की उपयुक्तता पर विचार करना था । इस समिति ने उपर्युक्त मुद्दों पर विस्तारपूर्वक विचार कर काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा सुझाए परिवर्तनों को स्वीकार कर लिया।


संविधान में राजभाषा घोषित होने के बाद से देवनागरी लिपि में लिखित हिन्दी को संघ की राजभाषा बनाया गया । राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने पर हिन्दी भाषा की लिपि वर्तनी और अंकों में एकरूपता लाने के लिए तत्कालीन शिक्षा मंत्रालय ने विविध स्तरों पर प्रयास किए। सन् 1953 में भारत के तत्कालीन उपराष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में देवनागरी लिपि सुधार परिषद की एक बैठक लखनऊ में हुई जिसमें पण्डि गोविन्दवल्लभ पन्त, श्री के. एम. मुंशी के अलावा अनेक मुख्य मंत्री, शिक्षा मंत्री, भाषाशास्त्री तथा साहित्यकार भी सम्मिल्लित थे। तत्कालीन शिक्षा मंत्रालय ने मानक देवनागरी वर्णमाला प्रकाशित की। इसमें प्रत्येक वर्ण का एक मानक रूप निर्धारित किया गया। वास्तव में मानकीकरण के लिए सरकारी स्तर पर केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।


हिन्दी के संघ की राजभाषा के रूप में स्थापित होने तथा विभिन्न भाषाओं के राज्यों की राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने के फलस्वरूप देवनागरी को देश की सामासिक संस्कृति का माध्यम बनाने के लिए भारतीय भाषाओं के मानक लिप्यन्तरण की आवश्यकता अनुभव की गई। देवनागरी में अन्य भारतीय भाषाओं की जिन विशिष्ट ध्वनियों के लिपि चिह्न नहीं थे, उनके लिए लिपि-चिह्नों का निर्धारण किया गया और सन् 1966 में परिवर्धित देवनागरी नामक पुस्तिका प्रकाशित की गई।


आज हिन्दी का प्रयोग विभिन्न प्रयोग क्षेत्रों में होने लगा है। साथ ही टंकण, मुद्रण और कंप्यूटर में हिन्दी के बढ़ते प्रयोग ने भाषा प्रयोग के विविध क्षेत्रों का विकास किया तथा सहज रूप से काम करने के लिए इसमें संशोधन परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव की जाती रही है।


सन् 1967 में केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा प्रकाशित देवनागरी लिपि का मानकीकरण पुस्तिका में हिन्दी वर्णों में निम्नलिखित परिवर्तन किए गए। पहले टंकण की आवश्यकता तथा लेखन को रेखीय आधार प्रदान करते हुए द्वित्वों को ऊपर नीचे न लिखकर रेखीय क्रम में लिखने का सुझाव दिया गया। जैसे-


हिन्दी में द्वित्वों (संयुक्त व्यंजनों को संस्कृत के अनुसार ऊपर-नीचे लिखने की परम्परा थी । प्रारम्भ में हिन्दी को टंकण के लिए उपयुक्त बनाने के लिए रेखीय क्रम में लिखने की आवश्यकता के अनुरूप रेखीय क्रमा प्रस्ताव किया गया।


i.खड़ी पाई वाले व्यंजनों (ख, ग, घ, च, ज, न, म, स आदि) के संयुक्त रूप परम्परागत तरीके से खड़ीपाई हटाकर ही बनाए जाएँ। जैसे ख्याति, लग्न, विघ्न, कुत्ता, डिब्बा, अन्य, सभ्य, उल्लेख आदि।


ii. क. फ / फ़ के संयुक्ताक्षर - क फ / फ़ के हुक को हटाकर संयुक्ताक्षर बनाए जाएँ। जैसे पक्का, युक्त सिफ़्त आदि।


iii. छ, ट, ठ, ड, ढ, द और ह के संयुक्ताक्षर उपर्युक्त वर्णों के संयुक्ताक्षर हल् चिह्न लगाकर ही बनाए जाएँ। जैसे- लट्टू, चिट्ठी, बुद्ध, विद्या, चिह्न आदि (लट्टू, चिट्ठी, बुद्ध, चिह्न, ब्रह्मा नहीं) ।


Iv. हल् चिह्न से बनने वाले संयुक्ताक्षर के दूसरे व्यंजन के साथ इ का मात्रा का प्रयोग सम्बन्धित व्यंजन से पहले किया जाएगा। जैसे - चिट्ठियाँ (चिट्टियाँ नहीं) बुद्धि (बुद्धि या बुदिध नहीं), द्वितीय (दिवतीय नहीं) आदि ।