सतत विकास की अवधारणा - concept of sustainable development

सतत विकास की अवधारणा - concept of sustainable development

सतत विकास के लिए धारणीय, संपोषणीय, निर्वहनीय, टिकाऊ, शाश्वत या वहनीय विकास आदि शब्दों का भी प्रयोग किया जाता है। सतत विकास का तात्पर्य विकास के उस अनुकूलतम स्तर से है जो पर्यावरण को क्षति पहुँचाएं बगैर संसाधनों के इष्टतम उपयोग से प्राप्त किया जाता है। इसके बाद पूंजी कुशल, श्रम, तकनीक आदि के प्रयोग के बावजूद भी यदि अधिकतम विकास अर्थात अंधाधुंध विकास का प्रयास किया जाता है तो पर्यावरण को स्थायी रूप से क्षति पहुँचने लगती है। इस प्रकार विकास का यह स्तर लम्बे समय तक नहीं चल सकता।






जनसंख्या की तीव्र वृद्धि के कारण हमारे संसाधनों का अधिक अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है जिसके कारण अनेक प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो गयी है। यह दोहन विकसित और विकासशील देशों में अधिक विकास के अवसरों को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है। विकास से अभिप्राय यह है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर संसाधनो के दोहन पर निर्भर करेगी। परंतु प्राकृतिक संसाधन, जिस पर वर्तमान औद्योगिकरण निर्भर है, सीमित है। अतः विकसित एवं विकासशील देशों की, भावी पीढियो के लिए भी संसाधनो को बचाकर रखना होगा। आर्थिक विकास से जहाँ एक ओर प्राकृतिक संसाधनों का नुकसान हुआ है वही पर्यावरण भी असंतुलित हुआ है। परिणामस्कप विकास संबंधी विशेषज्ञों ने वर्तमान एवं भावी पीढ़ी की आवश्कताओं को ध्यान में रखते हुए विकास संबंधी एक नवीन अवधारणा पर बल दिया जिसे सतत विकास, अक्षय विकास या वहनीय विकास के नाम से जाना जाता है। सतत विकास का अर्थ यह कि आर्थिक विकास की विकास दर को बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण एवं परिस्थितिकी के बचाव को ध्यान में रखकर प्राकृतिक संसाधनों की उत्पादन शक्ति को बनाए रखा जाए।


सतत विकास की इस अवधारणा में पर्यावरण के अनुकूल विकास के साथ ही संसाधनों को भावी पीढ़ियों के लिए बचाए रखने पर बल दिया जाता है।


पहली बार सतत विकास शब्द का प्रयोग IUCN (International Union for Conservation of Nature and Natural Composition) ने अपनी रिपोर्ट 'विश्व संरक्षण रणनीति' में किया। लेकिन इस शब्द की परिभाषा और कार्य पद्धति की व्याख्या 1987 ई. WCED (World Commission on Environment and Development) ने Our Common Future' नामक रिपोर्ट में की।


इस रिपोर्ट के अनुसार सतत या टिकाऊ विकास वह विकास है, जिसके अंतर्गत भावी पीढियों के लिए आवश्कताओं की पूर्ति करने की क्षमताओं से समझौता किए बिना वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं को पूरा किया जाता है। अत: पर्यावरण संरक्षण के बिना विकास को निर्वहनीय नहीं बनाया जा सकता है। पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के मध्य एक वांछित संतुलन बनाए रखना ही सतत विकास है।


वर्तमान में सतत विकास का एक वैश्विक दृष्टिकोण बन गया है। 1992 ई. के पृथ्वी सम्मेलन में घोषित एजेंडा - 21 में रियो घोषणा पत्र में इसके प्रति पूर्ण समर्थन व्यक्त किया गया। 2002 ई. के जोहांसबर्ग सम्मेलन का मूल मुद्दा ही सतत विकास था।







सतत विकास का अर्थ यह है कि आर्थिक विकास की दर को बढ़ाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग न करके पर्यावरण और परिस्थितिकी के बचाव को ध्यान में रखकर प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाना चाहिए जिससे भावी पीढ़ी के लिए, प्राकृतिक संसाधनों की उत्पादन शक्ति को बचाए रखा जा सके। यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग न करके विकास कैसे हो सकता है? मानव की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए बहसे हुई जिसमें यह निर्णय लिया गया कि मानव जाति की समकालीन समाज की चुनौतियों का सामना करने के लिए प्राकृतिक संसाधन सहायक है। विकास के साथ-साथ जनसंख्या, आर्थिक वृद्धि, पूँजी तथा प्रौद्योगिकी उत्पादन में वृद्धि होती है। लेकिन माँगों में बढ़ोतरी का आधार प्राकृतिक संसाधन है और प्राकृतिक संसाधन पर्यावरण पर आधारित होता है जो कि विकास में सहायक है। प्राचीन काल से ही मनुष्य ने अपनी विलासिता के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दुरूपयोग किया। मनुष्य के इस कृत्य ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया। जैसे-जैसे मानव पर जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया, मानव जाति ने अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए अधिक से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण किया जिसके परिणामस्वरूप पर्यावरण का सीमित उपयोग नहीं हो पा रहा है और गंभीर समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं जो मानव जीवन के अस्तित्व के लिए गंभीर चुनौती हैं। आज वर्तमान समय में मानव जाति ने पर्यावरण को स्वयं ही नष्ट किया है जिसके कारण आज वह संकटों के चक्रव्यूह से घिरा है। मानव बिना चेतना, बिना विचारपूर्वक और बिना संगठन के पर्यावरण का अधिक से अधिक दोहन कर रहा है। नीतियों एवं कार्यक्रमों को बनाने के उद्देश्य से विकासवादी अर्थशास्त्रियों ने सतत या वहनीय विकास की अवधारणा को विभिन्न अंतर्संबंधित घटकों में विभाजित किया है। नीति और कार्यक्रमों का पूर्णपेण परिणाम विकास होता है। अत: कहा जाता है कि उद्देश्य पूर्ण नीति विकास में सहायक होती है। जब हम सतत विकास के परिप्रेक्ष्य में बात कर रहे हैं तो कोई इस बात से परहेज नहीं कर सकता कि सतत विकास एक ऐसा विकास है जिसमें संसाधनों के समुचित प्रयोग पर जोर दिया जाता है। सतत विकास के अंतर्गत पर्यावरण संरक्षण पर विशेष रूप ध्यान दिया जाता है।






सतत विकास की अवधारणा में शामिल किये गये अन्तर्सम्बन्ध घटक इस प्रकार है - 


1. ऐसी अर्थव्यवस्था जो स्वस्थ वृद्धिमूलक हो


2. सामाजिक समानता के प्रति वचनबद्धत हो 


3. पर्यावरण संरक्षण करने वाली हो।


सतत विकास का लक्ष्य एवं उद्देश्य 


सतत विकास की आवश्यकताएँ एवं वैश्विक प्रयास