जनजाति की अवधारणा - concept of tribe

 जनजाति की अवधारणा - concept of tribe


जनजाति शब्द, Tribe का हिंदी रूपांतरण है। विश्व के अलग-अलग देशों में इन समुदायों के लिए अलग-अलग शब्द प्रयुक्त होते हैं, जैसे नृजातीय समुदाय (Ethnic Group), मूल निवासी (Aboriginals) एवं जनजाति (Tribe) इत्यादि । ब्रिटेन में इस समुदायों के लिए जनजाति शब्द प्रयुक्त होता है, और औपनिवेशिक काल से हमारे देश में भी इन्हें जनजाति कहा गया, यद्यपि भारत में विद्वानों एवं समाज सुधारको ने इन्हें बहुत से नाम दिए हैं जैसे गिरिजन, वन्य जन, आदिवासी, वनवासी, मूलनिवासी, एवं जनजाति इत्यादि। जनजाति वे समुदाय हैं, जिन्हें किसी क्षेत्र विशेष में उन्हें वहां का मूल निवासी माना जाता है, एवं उन्हें उनकी नृजातीयता के आधार पर पहचाना जाता है। भारत में जनजाति की अवधारणा को समझने के लिए दो परिप्रेक्ष्य हैं. एक समाज वैज्ञानिकों का और दूसरा संवैधानिक परिप्रेक्ष्य।


समाज वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य विशेषताओं पर आधारित है, अर्थात समाज वैज्ञानिक (समाजशास्त्री एवं मानवशास्त्री) कुछ सामाजिक सांस्कृतिक एवं आर्थिक विशेषताओं के आधार पर किसी समुदाय को जनजाति के रूप में चिन्हित करते हैं।

संवैधानिक परिप्रेक्ष्य, समाज वैज्ञानिक आधार पर ही निर्भर करता है, अर्थात हमारे देश के संविधान में जिन जनजातीय समुदायों को सूचीबद्ध किया गया है, वह समुदाय अनुसूचित जनजाति हैं। वास्तव में औपनिवेशिक काल से ही जनजातीय विकास के प्रयास प्रारंभ हो गए थे। यद्यपि इन प्रयासों का मुख्य उद्देश्य जनजातियों का विकास नहीं था बल्कि जनजातीय समुदायों के ब्रिटिश शासन के •प्रति असंतोष को दबाना इन प्रयासों का वास्तविक उद्देश्य कहा जा सकता है। स्वतंत्रता के पश्चात देश के समग्र विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु, विकास की प्रक्रिया में पीछे छूट गए समुदायों को पिछड़े समूहों (Weaker section) के रूप में चिन्हित किया गया। इसी क्रम में जनजातियों को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के अंतर्गत सूचीबद्ध किया गया। इस प्रकार वे जनजातियां जो संविधान में सूचीबद्ध हैं अनुसूचित जनजातियां कहलाती हैं। संविधान की 5वी एवं 6वी अनुसूची अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं। जिन समाज वैज्ञानिकों ने जनजाति' की अवधारणा को स्पष्ट करने का प्रयास किया है, यदि हम उनके विचारों को एक साथ मिलाकर देखें तो स्पष्ट होता है की जनजाति वह समुदाय हैं, जिनमें संस्कृति एवं सामाजिक संस्थाओं आदि में समानता हैं, संबंध नातेदारी पर आधारित हैं, आर्थिक एवं राजनैतिक संस्थाओं का स्वरूप सरल है, तथा अनौपचारिक संबंधों एवं व्यवहार की प्रमुखता है। निम्नलिखित विद्वानों ने जनजाति को इस प्रकार परिभाषित किया है-


डी.एन.मजूमदार के अनुसार "जनजाति कुछ परिवार या परिवारों के समूह का संकलन है, जिसका एक नाम होता है, जिसके सदस्य एक निश्चित भू-भाग में रहते हैं। समान भाषा बोलते हैं एवं विवाह, व्यवसाय आदि में कुछ निषेधों का पालन करते हैं।” 


हॉबेल के अनुसार “एक जनजाति एक सामाजिक समूह है, जिसकी एक विशेष भाषा होती है। जो एक विशेष संस्कृति का अनुसरण करता है। यह संस्कृति उसे अन्य जनजातियों से प्रथक करती है।” 


इम्पीरियल गजेटियर के अनुसार “जनजाति आदिम जाति परिवारों का वह समूह है, जिसका एक - सामान्य नाम होता है, जिसके सदस्य एक सामान्य भाषा बोलते हैं. एक सामान्य क्षेत्र में रहते हैं। सामान्यतः ये समूह अंतर्विवाही होते हैं।"


रेमण्ड फर्थ के अनुसार- “जनजाति एक ही सांस्कृतिक श्रृंखला का मानव समूह है, जो साधारणतः एक ही भूखण्ड पर रहता है, एक भाषा बोलता है तथा एक ही प्रकार की परंपराओं का पालन करता है।" 


जॉन पीटर मर्डाक के अनुसार जनजाति एक सामाजिक समूह है जिसकी अलग भाषा होती है तथा भिन्न संस्कृति एवं एक स्वाधीन राजनैतिक संगठन होता है।"


रिवर्स ने जनजाति को परिभाषित करते हुए लिखा है- “जनजाति एक साधारण कोटि का सामाजिक समूह है, जिसके सदस्य एक सामान्य भाषा बोलते हैं, उनकी एक शासन प्रणाली होती है तथा जो सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए युद्ध आदि में एकता का प्रदर्शन करते हैं।”


उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर यदि हम “जनजाति" की अवधारणा को स्पष्ट करने का प्रयास करें तो, हम कह सकते हैं कि "जनजाति" वह समुदाय है, जो अपनी संस्कृति, भाषा, सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था एवं राजनैतिक संगठन के आधार पर गैर-जनजातीय समुदायों से भिन्न एवं विशेष है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परिवर्तन के व्यापक प्रभाव एवं नियोजित विकासोन्मुखी योजनाओं के फलस्वरूप परिदृश्य बदला है, आज जनजातीय जगत वैसा नहीं है जैसा कि स्वतंत्रता के पूर्व था, परंतु आज भी कुछ मौलिक विशेषताएं हैं, जिनके आधार पर जनजाति" को चिन्हित किया जा सकता है।