स्वाभाविक प्रयोग विधि , गुण - natural method, properties
स्वाभाविक प्रयोग विधि , गुण - natural method, properties
समाज मनोविज्ञान में स्वाभाविक प्रयोग विधि का भी प्रयोग किया जाता है। हां, इतना अवश्य है कि इस विधि का प्रयोग प्रथम दो विधियों के सामान बहुत नहीं हुआ है। कभी कभी समाज में वैज्ञानिकों को कुछ इस प्रकार के सामाजिक व्यवहार ओं का भी अध्ययन करना पड़ता है जिस में स्वतंत्र चर तो होते हैं परंतु कुछ नैतिक तथा कानूनी प्रतिबंध के कारण उसमें जोड़ तोड़ ना तो प्रयोगशाला में किया जा सकता है और ना ही क्षेत्र में। जैसे महामारी, छुआछूत की बीमारियां, स्कूल या कॉलेज में असफलता, परिवार में किसी महत्वपूर्ण सदस्य की मृत्यु, बाढ़, भूकंप, पदोन्नति आदि कुछ इस प्रकार के कारक हैं जिन्हें कोई भी प्रयोग करता व्यक्तियों के व्यवहार ओं पर के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए अपनी ओर से उत्पन्न नहीं कर सकता है। अतः वह एक ऐसे समय तक इंतजार करता है
जब इस प्रकार के प्राकृतिक कारक अपने आप उत्पन्न हो जाए ताकि उस समय वह व्यक्तियों के सामाजिक व्यवहार पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर सके तथा उससे संबंधित आंकड़ों का संकलन कर सके। इसे ही स्वाभाविक प्रयोग विधि संज्ञा दी जाती है।
स्वाभाविक प्रयोग विधि के गुण
(i) इस विधि में प्रयोग बिल्कुल ही वास्तविक परिस्थिति में किया जाता है। अतः इसके परिणाम की वैधता पर किसी प्रकार का कोई शक नहीं किया जा सकता।
(ii) इस प्रयोग विधि में प्रयोग करता को प्रयोजन कम करनी होती है तथा साथ ही साथ कोई विशेष नियंत्रण की जरूरत नहीं पड़ती है।
इस प्रयोग विधि के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं
(i) इस विधि में प्रयोग करता को एक खास समय के लिए इंतजार करना पड़ता है जब तक कोई स्वभाविक घटना घट नहीं जाती वह प्रयोग नहीं कर सकता।
(ii) इस तरह के प्रयोज्य का चयन कोई वैज्ञानिक विधि द्वारा प्रायः नहीं होता है। जो कोई भी मिल जाता है. उसे प्रयोज्य बना लिया जाता है इससे परिणाम दोषपूर्ण हो सकता है।
इस तरह से हम देखते हैं कि समाज मनोविज्ञान में प्रयोगात्मक विधि का उपयोग 3 उप विधियों के रूप में किया गया है। यद्यपि तीनों उप विधियों के अपने अपने गुण दोष हैं, फिर भी आधुनिक सामाजिक मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला प्रयोग को सबसे ज्यादा पसंद करते हैं।
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