इतिहास का अन्य विषयों से संबंध - relation of history to other subjects
इतिहास का अन्य विषयों से संबंध - relation of history to other subjects
सर्वविदित है कि इतिहास का विषय क्षेत्र बहुत ही व्यापक है। ब्यूरो ने कहा था कि इतिहास में न केवल राजनीति, अपितु धर्म, कला, शासन, कानून व परंपराओं के साथ ही व्यक्ति और समाज की बौद्धिक मौलिक और भावात्मक क्रियाओं का अध्ययन होता है। इसलिए इसका संबंध अन्य विषयों से होना स्वयं सिद्ध है। वास्तव में इतिहास मनुष्य के समस्त संगठित सामाजिक समूहों के सभी पहलुओं का अध्ययन करता है। गैरोन्सकी ने ठीक ही लिखा है कि इतिहास विगत मानवीय समाज का मानवतावादी एवं व्यत्मक अध्ययन है जिसका उद्देश्य वर्तमान के विषय में अंतर्दृष्टि प्राप्त करना तथा अनुकूल भविष्य को प्रभावित करने की आशा है। इस प्रकार मानव समाज के अध्ययन की दृष्टि से इतिहास समस्त समाज विज्ञानों से पनिष्ठता संबद्ध है।
इतिहास एवं अन्य विषय
श्री जॉन्सन महोदय के अनुसार इतिहास सभी अन्य सामाजिक विज्ञानों की पृष्ठभूमि अथवा संगम स्थल रहा है। ज्ञान की प्रत्येक शाखा विषय चाहे जितनी स्वतंत्र हो लेकिन अन्य शानशाखाओं (विषया) से कम या अधिक संबंधित होता ही है तथा वह अन्य ज्ञानशाखाओं (विषया) को कुछ सीमा तक प्रभावित भी करती है। पिछले कुछ दशकों में अंतर विषयक के अध्ययन का महत्व विशेष रूप से दिखाई देता है। इतिहास के विषय में विचार करते समय इतिहास को शास्त्रीय विषयों में सम्मिलित करें या नहीं? क्या इतिहास शास्त्र है? यही नहीं, तो क्या इतिहास का समावेश सामाजिक शास्त्रों में करें या नहीं? इतिहास की लेखन प्रणाली शास्त्रीय है या नहीं? आदि अनेक विवादास्पद प्रश्न उठाए जाते हैं परंतु इतिहास भूतकालीन मानव जीवन का अध्ययन करने वाला विषय होने से और सभी विषय मानव जीवन से जुड़े होने से इतिहास का अन्य विषयों में केवल मानविकी शास्त्रों से ही नहीं, बल्कि भौतिक शाखों से भी निकट का संबंध है अतः यह मुद्दा विवाद से परे है। प्रमुख विचारक बेकन के अनुसार ये सभी विषय मानव के विकास में अपने अपने तरीके से योगदान देते हैं।
इतिहास के संबद्ध शास्त्र
इतिहास के संबद्ध शास्त्र या विषय अधिकांशतया मानव जीवन के विभिन्न अंगों का अध्ययन करने वाले विषय है, इसलिए उनका इतिहास से निकट का संबंध है। किसी भी का विषय अ व्यक्ति का इतिहास लिखना हो तो शोधकर्ता को तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक एवं भौगोलिक स्थिति, मूलभूत वैचारिक अवधारणा एवं व्यक्ति अथवा समूह की मानसिकता का अध्ययन करना होता है। अतः संबद्ध विषय का इतिहास से गहरा संबंध होता है क्योंकि उनके अध्ययन का केंद्रबिंदु भी मनुष्य ही होता है। किंतु इतिहास एवं उसके सहायक शास्त्रों के मध्य पारदर्शक दीवार होती है। भूगोल मानवशास्त्र, पुरातत्वशास्त्र, अभिलेखाशास्त्र मुद्राशास्त्र भाषाशास्त्र प्रतिमाशास्त्र आदि शास्त्र इतिहास के सहायक शास्त्र माने जाते हैं, क्योंकि उनके अध्ययन का केंद मनुष्य नहीं है, लेकिन पूर्वकालीन मानव का अध्ययन यथार्थ रूप से करने में ये शास्त्र मूल एवं निश्चित जानकारी इतिहासकार को देते है निष्कर्षतः उनके स्वतंत्र अनुसंधान से एकत्रित ज्ञान इतिहास लेखन को मूल लेखनकार्य में लाभप्रद होता है। ईएच. कार ने इसे कच्चा माल कहा है।
इतिहास के सहायक शास्त्रों में मुख्य रूप से राजनीतिशास्त्र अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, साहित्य, भूगोल, मानवशास्त्र आदि का समावेश किया जाता है। 19 वीं सदी में लिओपोल्ड रांके जैसे इतिहास अध्येता ने इतिहास के शास्त्रीय स्वरूप पर बल दिया। अतः 20 वीं सदी में जे. बी. बरी, ई.एच. कार, मार्क ब्लॉच नामक इतिहासज्ञ इतिहास के सामाजिक शास्त्र होने पर दृढ़ता से बल देते दिखाई देते हैं। 1.3.3.3 इतिहास के सहायक शास्त्र
इतिहास लेखन के लिए मूल जानकारी प्रदान करने वाले इतिहास के सहायक शास भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। विषयों के रूप में इन शास्त्रों का विकास विशेष रूप से बीसवीं सदी में हुआ। उनकी कार्य प्रणाली पूर्णतः वैज्ञानिक स्वरूप की है। उनके द्वारा अचूक ऐतिहासिक प्रमाण इतिहासकार को उपलब्ध होते हैं। उन्हें इतिहास के पूरक शास्त्र भी कहा जाता है। ऐसी अध्ययन शाखाओं में कालगणनाशास्त्र (Chronology) मुद्राशास्त्र (Numisuatics), पुरातत्वशास्त्र (Archaeology), अभिलेखशाख (Epigraphy), लिपिशास्त्र (Palcography), मानव शास्त्र (Anthropology) एवं प्रतिमाशास्त्र (Iconography) आदि का मुख्य रूप से समावेश होता है। इसके अलावा जीवविज्ञान (Biology) रसायनशास्त्र (Chemistry), भौतिकशास्त्र (Physics), पारिस्थितिकी शास्त्र (Ecology), आदि विधान भी अचूक प्रमाण प्राप्त करने तथा प्रमाणों की विश्वसनीयता सिद्ध करने में उपयोगी होते हैं।
इतिहास तथा उसके सहायक शास्त्रों जैसे पुरातत्व पुरालेखशाल प्रतिमाशास्त्र और मुद्राशास्त्र का विवरण निम्नानुसार वर्णित है।
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