भारतीय इतिहास का अध्ययन क्षेत्र - Field of study of Indian history
भारतीय इतिहास का अध्ययन क्षेत्र - Field of study of Indian history
आदिकाल से आधुनिक युग तक इतिहास क्षेत्र का स्वरूप निरंतर परिवर्तनशील रहा है। समय के साथ-साथ इतिहासकार की दृष्टि में जिस तरह परिवर्तन आता गया उसी तरह इतिहास विषय के अध्ययन संबंधी कल्पनाओं में भी परिवर्तन आया। फलस्वरूप इतिहास लेखन के विषय भी बदलते गए। इस दृष्टि से वॉल्श का यह कथन उचित है कि "History as we know it today as a developed branch of learning is a comparatively new thing. It scarcerly existed before the 19th century." अर्थात् इतिहास जिसे हम आज ज्ञान की एक विकसित विद्या के रूप में जानते हैं, वास्तव में अन्य विषयों की तुलना में एक नवीन विषय है। 1 9वीं शताब्दी से पहले तो इसका अस्तित्व अज्ञात ही था। इतिहास के विकसित स्वरूप का एकमात्र आधार विभिन्न युगों के सामाजिक मूल्य तथा उनकी सामाजिक आवश्यकताएँ रही हैं। प्रारंभ में इतिहास चिंतन का उद्गम अतृप्त ज्ञानतृष्णा को तृप्त करने के उद्देश्य से हुआ था। इस उद्देश्य से प्रेरित होकर प्राचीन इतिहासकारों ने इतिहास का अध्ययन किया।
प्रारंभ में यूनानियों ने इतिहास लेखन के लिए प्रमुख रूप से राजनीतिक घटनाओं आंदोलनों एवं युद्धों के विषयों का चयन किया क्योंकि ये घटनाएँ ध्यानाकर्षक एवं राजनीतिक थीं। इसके अलावा उन दिनों में यातायात के साधन तथा संचार माध्यम अत्यंत अल्प होने के कारण समकालीन अथवा निकट भूतकाल की घटनाओं को उन्होंने अपने वर्णन का विषय बनाया। राजनीतिक घटनाओं में लोगों की रुचि होती थी और उस विषय में जानकारी सरलता से प्राप्त भी हो जाती थी। फलस्वरूप हेरोडोट्स, ब्यूसिडाइड्स एवं रोमन इतिहास लेखकों द्वारा निकट भूतकाल की राजनीतिक घटनाओं का वर्णन किया गया है।
सभी इतिहासकारों ने प्रत्येक युग में इतिहास लेखन की आवश्यकता को स्वीकार किया है। मानव समाज में विकास की प्रक्रिया निरंतर रही है। इस विकास प्रक्रिया के साथ-साथ सामाजिक आवश्यकताएँ भी विकसित होती गई इतिहास क्षेत्र के अन्तर्गत जब इतिहासकार किसी घटना का क्रमबद्ध विवरण प्रस्तुत करता है तो उसके समक्ष तीन प्रश्न होते हैं घटना क्या है, घटना कैसे पटी तथा घटना क्यों घटी इतिहासकार इसी का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इतिहासकार के दो प्रमुखः कार्य हैं तथ्यों का संकलन तथा उनका विश्लेषण एक का स्वरूप विषयवादी एवं मानवतावादी है तथा दूसरे का वैज्ञानिक एवं वस्तुनिष्ठ है। ट्रेवेलियन के अनुसार इतिहासकार अपने इतिहास के प्रस्तुतीकरण में तीन प्रमुख उपादानों का प्रयोग करता है। वैज्ञानिक, परिकल्पनात्मक तथा साहित्यिक यद्यपि मानवीय कार्यों तथा उपलब्धियों पर प्रकृति का अध्ययन इतिहासकार के क्षेत्र से बाहर है। इतिहास क्षेत्र के अंतर्गत मनुष्य के एक साधारण कार्य से लेकर उसकी विविध उपलब्धियों का वर्णन होता है।
तीसरी सदी से पंद्रहवीं सदी तक का काल ईसाई जगत के धर्मनिष्ठ लेखन का काल था। इस अवधि में राजनीतिक विषय पूरी तरह पिछड़ गए और इस विश्व में ईश्वरीय कार्य, उसकी लीलाएं और संतों का वर्चस्व उनका जीवनकार्य एवं चमत्कार इतिहास के विषय बन गए। मानव कर्तव्य को उसमें स्थान नहीं मिला। अरबों के इतिहास लेखन के विषय भी लगभग यही रहे थे।
16वीं शताब्दी में यूरोप में हुए प्राचीन विद्या के पुर्नजीवन के बाद जो वैचारिक क्रांति हुई, उससे मानव जीवन की ओर देखने की नई मानववादी दृष्टि विकसित हुई। मानय के कर्तव्य के विषय में जिज्ञासा निर्मित हुई। अतः ईश्वर एवं उसके विषय में अध्ययन एक ओर रह गए और राजारजवाड़ों, सरदारों, अमीर-उमरावों का जीवन तथा साहसी वीरों के कार्य तथा शौर्य कथाएँ जैसे मानव के कार्यों से जुड़े लौकिक विषय ही इतिहासकार चुनने लगे। इस दृष्टि से विलियम कैमडन का हिस्ट्री ऑफ एलिजाबेथ तथा फ्रांसिस बेकन का दरेन ऑफ किंग हेनरी द सेवंथ जैसी रचनाएँ उल्लेखनीय हैं।
सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में अनेक साहसी वीर अज्ञात विश्व की खोज में समुद्री पर्यटन लिए निकले। उनके यात्रा वृत्तांतों से मानवी ज्ञान की शाखाएँ विस्तारित हुई। नई दुनिया के क्षितिज, वहाँ के लोग, संस्कृति इतिहासकारों को आकर्षित करने लगी। वाल्टर रैले जैसा विद्वान, राजनयिक एवं साहसी यात्री विश्व का इतिहास लिखने लगा। यह इतिहास का क्षेत्र विस्तृत होने का संकेत था।
अठारहवीं सदी में यातायात के साधन बढ़े और सुकू की यात्राएँ संभव हुई। यूरोप के इतिहासकार प्राचीन इतिहास को खंगालने लगे। इटली पहुँच कर संबंधित साहित्य का एवं पूर्वकाल के दस्तावेजों का गंभीरता से अध्ययन करने लगे। इसके साथ ही, केवल घटनाओं का अध्ययन इतिहास का विषय नहीं रहा, बल्कि दीर्घकाल के परिवर्तनों का अध्ययन होने लगा। एडवर्ड गिबन का Decline and fall of the Roman Empire नामक ग्रंथ इस तरह की व्यापक दृष्टि का बेहतर उदाहरण है। इस तरह इतिहास का तत्वज्ञान प्रस्तुत करने वाले विचारकों में इटली के विको, फ्रॉस के बोल्टेयर जोहान हर्डर, एंटनी कॉण्डरसेट के नाम उल्लेखनीय हैं।
उन्नीसवीं सदी में तो इतिहास के विषय में बुनियादी परिवर्तन हुए इस काल में मानवी जीवन का अधिकाधिक व्यापक दृष्टि से विचार होने लगा। मनुष्य एकाकी जीव न होकर वह समाज का अविभाज्य अंग बन गया और उसके विकास में समाज का बहुत बड़ा योगदान है और इसीलिए वह जिस समाज में रहता है उस समाज का अध्ययन प्राप्त करने लगा। राऊज कहता है, "History is essesntially a record of the men in societies, in their geographical and physical environment." इतिहास यदि पूर्वकाल के मानवी जीवन का अध्ययन हो तो राजनीतिक घटनाओं के साथ ही आर्थिक सामाजिक तथा सांस्कृतिक घटनाओं का विचार भी इतिहासकार को करना चाहिए, इसके बिना मानवी जीवन के यथार्थ का आकलन नहीं होगा। इस भूमिका से सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक इतिहास के नए द्वार खुलने लगे। कार्ल मार्क्स द्वारा इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या के बाद इतिहास लेखन में आर्थिक मूल्यों का नवीन प्रवाह प्रचलित होने लगा।
बीसवीं सदी में इतिहास विषय का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत हो गया। पूर्वकाल के मानवी जीवन पर प्रकाश डालने वाली अनेक ज्ञानशाखाओं के अध्ययन को इस काल में प्रोत्साहन मिलने से इतिहास लेखन के लिए नए विषय एवं नई सामग्री उपलब्ध होने लगी। पुरातत्वशास्त्र मुद्राशास्त्र, अभिलेखशास्त्र, प्रतिमाशास्त्र जैसे इतिहास के सहायक विषयों ने इतिहास को भरपूर जानकारी उपलब्ध कराई और इस जानकारी के आधार पर इतिहासकार नवीन एवं अज्ञात विषयों का अध्ययन करने लगे।
भूतकालिक समाज संस्कृति एवं सभ्यता का चित्रण करना ही इतिहास का उद्देश्य होता है। किसी भी संस्कृति एवं सभ्यता से संबंधित भौगोलिक दशा वातावरण, आर्थिक व्यवस्था, राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक प्रशासनिक संवैधानिक कानून, न्याय व्यवस्था, सुरक्षा व्यवस्था आदि का विवरण इतिहास में आवश्यक हो जाता है। इतिहासकार से अपेक्षा की जाती है कि इन सभी विषयों का उचित विवरण समाज के समक्ष प्रस्तुत करे। यदि संस्कृति एवं सभ्यता का क्षेत्र विस्तृत है तो इतिहासकार के लिए इन सभी प्रश्नों का उत्तर देना संभव नहीं है। इसीलिए आधुनिक इतिहासकारों ने इतिहास के अध्ययन क्षेत्र का वर्गीकरण किया है। इतिहास के अध्ययन क्षेत्र का यह वर्गीकरण वैज्ञानिक युग की देन है। ऐतिहासिक अन्वेषण की आधुनिक विधियों ने इतिहास के सामान्य ज्ञान की अपेक्षा विशिष्ट ज्ञान की उपादेयता को सिद्ध किया है। परिणामस्वरूप इतिहास का विभाजन न केवल प्राचीन मध्ययुगीन तथा आधुनिक काल में किया गया है बल्कि इसके अंतर्गत अनेक छोटी-छोटी शाखाओं पर शोध करके इतिहासकारों ने विशिष्ट ज्ञान प्राप्त किया है। इस प्रकार इतिहास का अध्ययन क्षेत्र निरंतर विकसित होता जा रहा है।
देवी के अनुसार, इतिहास के अध्ययन क्षेत्र का वर्गीकरण उपयोगी तथा स्वाभाविक है। इसका एक मात्र उद्देश्य विशेष तथा परिवर्तित घटनाओं का ज्ञान प्राप्त करना है। एफ. सी. एस. शिलर ने भी इतिहास के अध्ययन क्षेत्र के वर्गीकरण के संबंध में कहा है कि विस्तृत वर्गीकरण दुर्लभ है, फिर भी इतिहासकारों ने भूतकालिक घटनाओं के आधार पर समस्त प्रश्नों का उत्तर देने के लिए इतिहास के अध्ययन क्षेत्र का वर्गीकरण किया है जिसका विवरण निम्नानुसार किया गया है।
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